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LOCKDOWN के बाद भारत की होगी एक सुन्दर तस्वीर, कोरोना संकट के बाद प्रत्येक क्षेत्र में होगा व्यापक परिवर्तन


डॉ. विजय सोनकर शास्त्री

पूर्व अध्यक्ष, राष्ट्रीय अनुसूचित जाति एवं जनजाति आयोग (भारत सरकार ) व पूर्व भाजपा सांसद 

भारत सहित पूरा विश्व कोरोना महामारी से निपटने के लिए जूझ रहा है। महामारी के कारण सभी तरह की गतिविधियों पर विराम लग चुका है और आज संपूर्ण मानव समाज घर के अंदर बंद होने के लिए बाध्य है। चीन-अमेरिका जैसे विकसित राष्ट्रों की अर्थ व्यवस्था में कोरोना महामारी का ग्रहण लग चुका है, वही प्रधानमंत्री श्री नरेन्द्र मोदी जी ने भारत को भी पूर्णरूपेण लॉक डाउन कर दिया गया है। लॉक डाउन के कारण सड़कें-बाजार सूनसान हैं और औद्योगिक गतिविधियां भी बंद हो चुकी है। कोरोना के कारण विश्व के अन्य देशों की अर्थव्यवस्था पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ा ही है और कुछ उसीप्रकार का प्रतिकूल प्रभाव भारत पर भी हुआ है। भारत में अब तक 20 हजार से अधिक व्यक्ति कोरोना की चपेट में आकर उपचार के लिए मजबूर हो चुके हैं। कोरोना से भारत में अब तक लगभग पांच सौ से अधिक लोगों की मौत हुई हैं, जबकि चिकित्सकों के भरपूर प्रयास की वजह से 2000 से अधिक लोग स्वस्थ होकर अबतक अपने अपने घरों को भी जा चुके हैं। कोरोना महामारी के कारण पूरा भारत बंद है और इस बंदी का प्रभाव सामाजिक, आर्थिक, राजनीतिक और शैक्षणिक स्तर पर बड़ी सरलता से इस समय देखा जा सकता है। ऐसे में स्वाभाविक रूप से यह अनुमान लगाया जा सकता है कि कोरोना के कारण भारत के अंदर जारी विकास प्रक्रिया पर भारी प्रभाव परिलक्षित होगा। संपूर्ण विकास प्रक्रिया ठप्प होने से भारत का विकास तो अवरुद्ध होगा, साथ ही भारत को कई अन्य तरह के संकट का भी सामना करना पड़ेगा।

प्रधानमंत्री श्री नरेन्द्र मोदी ने 2014 में सत्ता संभालते स्वच्छता अभियान, जन-धन योजना, डाइरेक्ट बैनिफिट्स ट्रांसफर योजना, उज्ज्वला योजना, पीएम बिजली योजना, पीएम गरीब अन्न योजना, आधार को खातों से जोड़ने का अभियान आज कोरोना महामारी से लड़ने हेतु कितना उपयोगी है। यह है प्रधानमंत्री मोदी जी की दूरदर्शिता, मानो उन्हें आभास था कि ना जाने क्या-क्या होगा? उन्होंने ने आते ही भारत को महान राष्ट्र बनाने की तैयारी में जुट गये थे। अब आगे भारत के विकास और विकास प्रक्रिया के सम्बन्ध में किये जा रहे दावों-प्रतिदावों के मध्य यदि विचार किया जाये तो कोरोना महामारी और इसके रोकथाम के लिए किया गया लॉक डाउन तथा सोशल डिस्टेंसिंग भारत के लिए एक बड़े सुअवसर के रूप में भी सामने आ सकता है। यदि लाॅक-डाउन और शोसल डिस्टेंसिंग जैसे उठाये गए कदमों का राष्ट्रीय एवं अंतरराष्ट्रीय परिप्रेक्ष्य में विविध दृष्टिकोण से गहन विश्लेषण किया जायेगा तो अनेकों दूरगामी परिणाम समयांतराल के उपरांत सुखद रूप से सामने आ सकता है। वर्तमान वातावरण का सामाजिक, आध्यात्मिक, आर्थिक, राजनीतिक एवं शैक्षणिक क्षेत्रों पर भरपूर प्रभाव पड़ रहा है। कोरोना महामारी भारत के भविष्य को किस तरह से गढ़ने में सहायक सिद्ध होगी, इसे बड़ी सरलता से विविध क्षेत्रों में होनेवाले परिवर्तनों को देखकर कुछ इस तरह से समझा जा सकता है.

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सामाजिक क्षेत्र में परिवर्तन

कोरोना महामारी के कारण प्रधानमंत्री श्री नरेन्द्र मोदी द्वारा घोषित लॉक डाउन एवं सोशल डिस्टेंसिंग का बड़ा ब्यापक प्रभाव भारत में अवस्थित प्रत्येक व्यक्ति, समाज, समुदाय, वर्ग, जाति, प्रजाति एवं पंथ पर परिलक्षित होगा। आज हर व्यक्ति घर में बंद है। घर में बंद रहने की इस जटिल और कठिन प्रक्रिया का सभी अपने-अपने ढंग से सामना कर रहे हैं I घर में बंद रहने से भारत में एक बार फिर संयुक्त परिवार नाम की संस्था और शक्तिशाली हुई है। सभी व्यक्ति किसी न किसी तरह से अपने परिवार के साथ भावनात्मक रूप से जुड़ गया है। लॉक डाउन से पहले तक परिवार के अंदर जो मतभेद थे, वह भी अब समाप्त हो चुके हैं। लॉक डाउन के मध्य छुआछूत, उच्च-निम्न और जाति भेद जैसी सामाजिक समस्याओं की दीवारें टूट चूंकि है। इसका उदाहरण कई नगरों, कस्बों और ग्रामीण क्षेत्र में सफाईकर्मियों, पुलिस के जवानों, डॉक्टरों सहित कोरोना से लड़ने में लगे अन्य लोगों पर बरसाए जाने वाले फूलों के रूप में बड़ी सरलता से देखा जा सकता है।

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लगभग 6500 जातियों एवं लगभग पचास हजार से अधिक उपजातियों में बंटे तथा मटर के दानों की तरह विखरे हुए हिन्दू समाज ने एक दूसरे के प्रति ममता और स्नेह का आभास किया। मुस्लिम समाज ने अपने भीतर के कट्टरपंथियों को बेनकाब किया और उनसे आग्रह किया कि जेहाद नहीं मानवतावादी दृष्टिकोण को अपनाया जाय। इसी प्रकार जैन पंथ, सिख पंथ एवं अन्यान्य पंथों पर भी पड़े प्रभावों को देखा जा सकता है। इसका स्पष्ट अर्थ यह भी है कि भारत की जनता के मस्तिष्क में कार्यों के आधार पर होने वाले भेदभाव की स्थापित मानसिकता (माइंड-सेट) बदली है। पहले जिन सफाई कर्मियों को लोग घर के अंदर बुलाने में अकारण संकोच करते थे, आज स्वयं सड़क पर जाकर खाने पीने के साथ उन्हें सम्मान देने में किसी प्रकार का कोई संकोच नहीं कर रहे है। यही हमारे भविष्य के समाज की एक अतीव सुन्दर एवं मानवतादी चित्र है। अस्पृश्यता हिन्दू समाज की एक बड़ी समस्या थी किन्तु आज इस सामाजिक समस्या का प्राकृतिक एवं वैज्ञानिक तर्क सरल रूप से स्पष्ट हुआ है। अब भारत में एक ऐसा समाज जहां कोई भी छोटा-बड़ा नहीं होगा। समाज की एकजुटता का यह नया परिवर्तित स्वरूप निश्चित रूप से समाज को नई दिशा में ले जाएगा और इसमें परिवार रुपी संस्था और मजबूत होकर सामने आएगी.

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राष्ट्र प्रथम एवं व्यक्ति द्वितीय का भाव प्रखर रूप से उभरकर सामने आया है। आज नमस्ते के साथ सामने वाले के समक्ष विनम्र भाव से झुकने की संस्कृति का पुनर्जीवन और योगासन द्वारा कोरोना से लड़ने वाले शारिरीक व्यायाम की श्रेष्ठता और प्राणायाम से हृदय एवं श्वसन तंत्र के लिए सर्वोत्तम व्यायाम को स्वीकार किया जा चुका है, वैसे ही अब भारतीय संस्कृति के मूल्य और संस्कार भी विश्व कल्याण की दृष्टि से सर्वश्रेष्ठ अनुकरणीय आचरण के रूप में स्वीकार किए जाएंगे है।

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यह एक कटु सत्य है कि भारत में कोरोना संक्रमण की एक बड़ी वजह तब्लीगी जमात के लोग बने हैं और कट्टर मुस्लिम जहां तब्लीगी जमात का बचाव करने के लिए सामने आये हैं, वही कट्टरता से दूर रहने वाला उदारवादी मुस्लिम समाज तब्लीगी जमात के विरोध में उठ खड़ा हुआ है I इससे लगने लगा है कि भविष्य में कट्टर मुस्लिम का विरोध करने के लिए, उनके अपने समाज के लोग ही उनके सामने खड़े होंगे। मुस्लिम समाज ने अपने भीतर के कट्टरपंथियों को बेनकाब किया और उनसे आग्रह किया कि वे जेहाद नहीं मानवतावादी दृष्टिकोण को अपनाये। यह प्रक्रिया देश में स्थापित धार्मिक दूरी को कम करने में सहायक सिद्ध होगी। कोरोना और लॉक डाउन के मध्य हिन्दू, मुस्लिम, ईसाई के मध्य एकजुटता बढ़ी है और सभी धर्मों के लोग कट्टरवादी एवं देश विरोधी तत्वों के सामने आकर उन्हें मुहतोड़ जवाब दे रहे हैं I निसंदेह यह स्थिति भारत के लिए एक नए अवसर पैदा करने में सहायक सिद्ध होगी, साथ ही भारतीय समाज को एकजुट करने का काम भी करेगी।

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आर्थिक परिवर्तन

यहाँ यह उल्लेख करने में किसी तरह का संकोच नहीं होता है कि भारत पर आर्थिक रूप से कोरोना महामारी ने बहुत नकारात्मक प्रभाव डाला है। अधिकतर कल-कारखाने और व्यवसाय बंद हैं। रेलवे, हवाई जहाज और भारी वाहनों की आवागमन को भी प्रतिबंधित किया गया है। निवेश, निर्यात और जरूरी वस्तुओं को छोड़कर अन्य उत्पादों की खपत थम गई है। केवल कृषि, खनन, उपयोगी सेवाएं, कुछ वित्तीय एवं आईटी सेवाएं और जन सेवाओं को ही काम करने की अनुमति मिली है। यह महामारी ऐसे समय आई, जब भारतीय अर्थव्यवस्था में साहसिक राजकोषीय और मौद्रिक उपायों के बाद पुनरुद्धार के संकेत दिख रहे थे। भारत ने पाँच ट्रिलियन डॉलर की अर्थव्यवस्था का प्रारूप खड़ा करने की दिशा में अग्रसर था। और अब विश्वव्यापी आर्थिक मंदी के मध्य कोरोना महामारी के रोकथाम हेतु घोषित लॉकडाउन से भारत की अर्थव्यवस्था पर सात से आठ लाख करोड़ रुपये का असर पड़ सकता है।भारत में बेरोजगारी बढ़ने के अनुमान जताये जा रहे हैं और आर्थिक क्षतिपूर्ति में एक लम्बा समयांतराल लगने के दावे भी किये जा रहे हैं.

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ऐसे अनेकों दावों-प्रतिदावों के मध्य यह कहना अनुचित नहीं लगता है कि कोरोना महामारी का आर्थिक प्रभाव केवल एक आंधी से ज्यादा और कुछ नहीं होगा। कोरोना महामारी के प्रभाव से भारत की अर्थव्यवस्था कुछ समय के लिए अस्पष्ट भी रहेगी, पर इसके बाद भारत की अर्थव्यवस्था का सुखद आयाम भी सामने आएगा और इसे बड़ी आसानी से समझा जा सकता है। कोरोना ने विश्व के विकसित अमेरिका, चीन, फ़्रांस, जापान जैसे देशों के साथ ही पूरे यूरोप को आर्थिक रूप से नष्ट करने की सीमा पर लाकर खड़ा कर दिया है। जिस देश से कोरोना वाइरस फैला है अर्थात चीन जिस तरह से यूरोप की बर्बाद हुई कंपनियों के कारण चर्चा में है कि नंबर वन आर्थिक ब्यवस्था के रूप में उभरेगा, वह उफान का बुलबुला अब टूटने लगा है। विकसित देशों की कंपनियों के उत्पादन के लिए भारत अब नयी प्राथमिकता बनेगा, इसमें कोई संदेह नहीं है। कोरोना महामारी से निपटने के बाद अधिकतर देश भारत की और दृष्टि करेंगे और यह तत्थ्य भारत के आर्थिक क्षेत्र के लिए एक बड़ी सहायता के रूप में सामने आएगा.

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भारतीय अर्थव्यवस्था के लिए अब वे नए दरवाजे भी अब खुलेंगे, जो अभी तक बंद थे I इसमें प्रधानमंत्री श्री नरेंद्र मोदी की उस विदेशी कूटनीति (मेडिकल) का सबसे बड़ा योगदान होगा, जिस कूटनीति को अमेरिका से लेकर छोटे-छोटे देशों ने कोरोना महामारी के मध्य स्वयं आभास किया है। भारत जैसा अपार जनसंख्या और सीमित संसाधनों वाला देश इस संकट से सफलता पूर्वक लड़ ही नहीं रहा बल्कि हाइड्रोक्लोरोक्विन और पेरासिटामोल जैसी आवश्यक दवाइयों की आपूर्ति विश्व के विभिन्न देशों को कर रहा है। क्योंकि यहाँ संवेदनाएँ भी हैं और मानवता भी है। यहाँ की सनातन संस्कृति में निःस्वार्थ सेवा, दया भाव, दान परंपरा, परोपकार भाव और सभी के हित की मंगलकामना के संस्कार पूरे देश को एक ऐसे सूत्र में बांधकर रखते हैं जो आपदा के समय टूटने के बजाए और सुसंगठित हो जाते हैं।

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लॉक डाउन में जिस तरह से एक नगर से दूसरे नगर और राज्यों के मध्य कामगारों, मजदूरों एवं अन्य कर्मियों का पलायन हुआ, उसे बड़ी त्रासदी के रूप में पेश करने में होड़ लगी हुई है। निसंदेह लॉक डाउन में अपने घर-परिवार, समाज, नगर, ग्राम तक पहुंच जाने के लिए निकले लोग चिंता का विषय हो सकते हैं, पर पलायन की प्रक्रिया यह संकेत भी देती है कि इससे नगरों, कस्बों और ग्रामों में रोजगार के अवसर बढ़ाने की जिस प्रक्रिया को मोदी सरकार ने प्रारंभ किया, उसे भी गति मिलेगी। अपने घर-परिवार के निकट रहकर काम और रोजगार करने का मनोभाव राज्यों में क्षेत्रीय औद्योगिक विकास को बढ़ाने में सहायक सिद्ध होगा और कृषि तथा कृषितर उत्पादों के क्षेत्र में भी भारी वृद्धि होगी। छोटे-छोटे उद्योग मजबूती के साथ उभरेंगे और फुटकर व्यवसायी भी फलेगे-फूलेंगे।

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आर्थिक विकास की यह प्रक्रिया कोरोना महामारी के उपरांत होने वाली एक महत्वपूर्ण प्रतिक्रिया के रूप में देखी जाएगी। हमारे देश में लगभग 40 प्रतिशत फुटकर, परचून, पटरी-रेहड़ी एवं छोटे-छोटे व्यवसायी वर्ग की संख्या है। यह वर्ग बड़ी तीव्र गति से गिरा है, किन्तु बाउन्स-बैक के आर्थिक सिध्दांत के अनुसार जैसे एक गेंद तीव्र गति से नीचे जाता है और पुनः उसी गति से वह उपर आता है, उसीप्रकार इस वर्ग का भी तीव्र उत्थान होगा। यह संकट देश की अर्थव्यवस्था और आवश्यक वस्तुओं के मामले में एक दूसरे पर अत्यधिक निर्भरता की अपनी-अपनी नीति का पुनर्निर्माण कर देश को आर्थिक आत्मनिर्भरता के प्रत्येक क्षेत्र में कदम उठाने के लिए प्रेरित करेगा।

1947 के बाद देश में आर्थिक विकास का जो तंत्र काम कर रहा था, वह अब समाप्त होगा और जो नया तंत्र लागू होगा, वह भारत के नवनिर्माण की प्रक्रिया की राह प्रशस्त करेगा। एशिया क्षेत्र में चीन की कमजोरी और भारत का पिछले छह साल में सशक्त तरीके से उभारना पूरे विश्व में भारत की आर्थिक शक्ति के प्रति विश्वास बढ़ाने का काम करेगा और इसके परिणाम आगामी छह से आठ माह के अंदर दृष्टिगत होने लगेंगे।

राजनीतिक परिवर्तन

कोरोना महामारी ने भारत के राजनीतिक क्षेत्र में भी परिवर्तन की प्रक्रिया को गति दी है। भाजपा नेतृत्व वाली मोदी सरकार ने महामारी की आहट को पहचान कर जिस तरह से कदम उठाये, उसकी आशा न तो देश के राजनीतिक क्षेत्र ने की थी और न ही वैश्विक स्तर पर भी विशेषज्ञों द्वारा की गयी थी I प्रधानमंत्री मोदी की दूरदृष्टि ने कोरोना को देश के अंदर अमेरिका, चीन, इटली, स्पेन जैसी महामारी बनने से पहले ही थाम लिया। समय रहते उठाये गए मोदी सरकार के कदमों की अब संपूर्ण विश्व द्वारा सराहना किया जा रहा है। इसके विपरीत भारत में भाजपा और मोदी सरकार के विरुद्ध कांग्रेस ने जिस तरह से गैर-उत्तरदायित्व वाली राजनीति का परिचय दिया, उसे जनता ने स्वयं देखा। कांग्रेस सहित अन्य विपक्षी दलों की राष्ट्रीय संकट के समय की जाने वाली नकारात्मक राजनीति का प्रत्युत्तर तो जनता ने प्रधानमंत्री मोदी के आह्वान पर ताली-थाली बजाकर और दीप जलाकर दिया।

भारतीय राजनीतिक क्षितिज पर श्री नरेन्द्र मोदी एक ऐसे नेता के रूप में उभरे हैं, जिन्हें जनता का भारी जन-समर्थन एवं विश्वास मिला है। विधायक, सांसद, मंत्री-प्रधानमंत्री एवं राष्ट्रपति इत्यादि तो पार्टी या पार्टीया बना सकतीं हैं किन्तु नेता, जन-नेता, राष्ट्र-पुरुष एवं युग-पुरुष तो जनता एवं केवल जनता ही बनाती है। कोरोना महामारी के मध्य भारत की जनता ने मोदी जी की नेतृत्व क्षमता एवं मार्मिक भूमिका के लिए उन्हें राष्ट्र-नायक एवं राष्ट्र-पुरुष तो बना ही दिया किन्तु उनकी दूरदर्शिता तथा नेतृत्व कौशल के कारण विश्व के शीर्ष नेताओं की श्रेणी मेंलाकर खड़ा कर दिया है। शेष विश्व को आज मोदी जी से अपेक्षाए है।

कोरोना महामारी के इस काल में देश की एकजुटता ने राजनीतिक ही नहीं अपितु प्रत्येक क्षेत्र के लोगों में सेवा और उत्तरदायित्व की जिस भावना को उत्पन्न किया, उसका परिणाम लॉक डाउन के मध्य घरों में बंद लोगों तक आवश्यक सामग्री पहुंचने में जुटे राजनीतिक कार्यकर्ताओं के रूप में सभी देख रहे हैं। राजनीतिक दलों, राजनीतिज्ञों एवं जनता में सरकार और सिस्टम के प्रति सम्मान बढ़ा है। राजनीतिक नेतृत्व की संवेदनशीलता और प्रशासन की कार्यप्रणाली ने जनता में नये भरोसे के भावना का संचार किया है और जमीनी स्तर पर वास्तविक रूप से काम करने वाले राजनीतिक दलों और कार्यकर्ताओं के प्रति जनता का भरोषा और अधिक सशक्त हुआ है। सिस्टम को लागू करते हुए सेवा भाव को अंजाम देने की प्रवृत्ति भारत में एक नयी जागरूक राजनीति को बढ़ावा देगी। मतदाताओं की जागरूकता राजनीति में नए परिवर्तन की वाहक बनेगी। यह निश्चित है कि कोरोना महामारी का संकट समाप्त होने के बाद राजनीतिक दलों को अपना स्व-मूल्यांकन करना ही पड़ेगा। जनता के अनुरूप ही अपनी गतिविधियों को केंद्रित करनें के उपरांत ही समाज में जाना पड़ेगा अन्यथा जनता उन्हें अस्वीकार करने में देर नहीं लगाएगी।

शैक्षणिक परिवर्तन

कोरोना महामारी काल में लॉक-डाउन और सोशल डिस्टेंसिंग ने शैक्षणिक गतिविधियों को बहुत बुरे ढंग से प्रभावित किया है। शैक्षणिक क्षेत्रों में इसका प्रभाव विस्तृत रूप से परिलक्षित है। लेकिन तकनीकि ने शैक्षणिक क्षेत्र की समस्या का समाधान निकालने तथा इसे और आसान बनाने में अपना योगदान दिया है। लॉक डाउन के मध्य इंटरनेट के प्रयोग ने शैक्षणिक क्षेत्र में एक नयी राह प्रशस्त किया है, उसके सुखद परिणाम भविष्य में भी दिखेंगे। आज भारत में प्राथमिक शिक्षा, माध्यमिक शिक्षा, उच्च शिक्षा और तकनीकी शिक्षा क्षेत्र में विषयवार डिजिटल कंटेंट को तैयार करके छात्रों के बीच प्रसारित किया जा रहा है। ऑनलाइन स्टडी का नया दौर प्राथमिक स्तर से प्रारंभ हो चुका और घर में बैठकर बच्चे शिक्षा ग्रहण कर रहे हैं। अभी मेट्रो और महानगरों में आन-लाइन शिक्षा प्रारंभ हो चुका है। अब शैक्षणिक जगत इसे ग्रामीण क्षेत्रों में ले जाने की चुनौतियों को स्वीकार करेगा। इस दिशा में केंद्र से लेकर राज्य की सरकार मिशन मोड में काम कर रही है और गूगल, व्हाट्सएप, इंटरनेट, दूरदर्शन और ऑल इंडिया रेडियो (एआईआर) के मजबूत नेटवर्क, डिजिटल अप्लीकेशन से जुड़े संसाधनों और सेवाओं की मदद ली है। लॉकडाउन के मध्य उच्च-गुणवत्ता वाली डिजिटल सामग्री, बच्चों के बीच जूम, स्काइप और व्हाट्सएप के माध्यम से माता-पिता और शिक्षकों को जोड़ने के साथ ही बच्चों के सीखने के परिणामों में सुधार का एक लंबा रास्ता तय करेगी I

इंटरेक्टिव गेम्स, कहानियां और पहेलियों के माध्यम से तथा शैक्षणिक सामग्री के एप्लीकेशन को पाठ्यक्रम एवं अन्यान्य रूपों में तैयार करके प्रस्तुत किया जा रहा है, जोकि तकनीकी शिक्षा एवं कौशल निर्माण पर केंद्रित होने के कारण अत्यंत उपयोगी सिद्ध होगा। घर में रहकर शिक्षा से जोड़ने के सरकारी और गैरसरकारी प्रयासों में जिस तरह से गति आयी है, उसके लिए लॉक डाउन एवं सोशल डिस्टेंसिंग को वरदान माना जा सकता है I शिक्षा के प्रति इस नए दृश्टिकोण का लाभ भविष्य में भी मिलेगा और यह देश के प्रत्येक बच्चे को शिक्षित बनाने का स्वप्न साकार करने में भी सहायक होगा।

निष्कर्ष : कोरोना महामारी संकट और लॉक डाउन ने भारत की गति को थाम जरूर रखा है, पर यह एक क्षणिक घटना के रूप में देखा जा सकता है. लॉक डाउन के समाप्त होने के बाद कोरोना संकट का प्रभाव कुछ समय तक अवश्य रहेगा, परन्तु उसके बाद भारत अपने समग्र विकास की जो गति पकड़ेगा, उसका परिणाम नव-भारत निर्माण के रूप में सामने आएगा, इसमें कोई संदेह नहीं है और न ही किसी और को भी संदेह होना चाहिए.


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पोल टॉक और PollTalk.In के सम्पादक संतोष कुमार पांडेय देश के कई शहरों में पत्रकारिता कर चुके हैं। ये शहर जो कार्यस्थल बने वाराणसी , लखनऊ, आगरा, देहरादून, नोएडा, जयपुर, बिहार, हैदराबाद, पानीपत, सतना में रहे हैं। इन संस्थानों में दी सेवाएं राजस्थान पत्रिका , दैनिक भास्कर, एग्रो भास्कर, हिन्दुस्थान, जनसन्देश न्यूज़ चैनल, जनसन्देश टाइम्स, ईटीवी भारत में कई वरिष्ठ पदों पर कार्य किये. राजनीति की सही जानकारी और कुछ रोचक इन्टरव्यू दिखाना प्राथमिकता है।

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