मायावती ने फिर अपनाई कांशीराम की राह, दलितों से लगाई उम्मीद की निगाह

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BSP supremo Mayawati

उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव 2022 में उत्तर प्रदेश में चार बार मुख्यमंत्री रह चुकीं मायावाती की पार्टी बहुजन समाज पार्टी को बहुत ही करारी हार झेलनी पड़ी। चुनाव नतीजों में बसपा को मात्र एक सीट ही हासिल कर पाई।
2022 के चुनाव से पहले और चुनाव के बाद मायावाती की जो रणनीति देखी जा रही है उससे साफ साफ समझ आ रहा है कि मायावाती एक बार फिर से अपने पैतृक वोटर यानी दलित वोटर की ओर चल पड़ीं हैं।
मायावाती ने एक के बाद एक कई नेताओं को पार्टी से बाहर का रास्ता दिखा दिया जिनमें ओबीसी और ब्राह्मण नेताओं के नाम शामिल हैं।

2017 के चुनाव में मिली हार के से ही मायावाती की पार्टी पर लगातर ब्राह्मणों की पार्टी होने का आरोप लगने लगा था। साथ ही यह भी कहा जा रहा था कि मायावाती ने कांशीराम की पार्टी के मूल वोटर यानी दलितों का साथ छोड़ दिया है। हालांकि 2022 के चुनाव के बाद एक बार फिर देखा जा रहा है कि मायावती डूबती बसपा को पार लगाने के लिए कांशीराम की बसपा में लौटना चाह रहीं हैं।

ओबीसी नेताओं को किया बाहर

यूपी के 2022 विधानसभा चुनाव से पहले ही मायावाती ने ओबीसी समाज से आने वाले नेताओं को पार्टी से बाहर का रास्ता दिखा दिया था। चुनाव से पहले मायावती ने बसपा के पूर्व प्रदेश अध्यक्ष रहे रामअचल राजभर और लाल जी वर्मा को पार्टी से निष्कासित कर दिया था।

ब्राह्मण नेताओं से भी दूरी

चुनाव के बाद मायावाती लगातार ब्राह्मण नेताओं से दूरी बना रहीं हैं। जहां एक तरफ अपने भतीजे आनंद को पार्टी का महासचिव नियुक्त किया है। वहीं पार्टी के बड़े ब्राह्मण बेटा सतीस चंद्र मिश्रा कहीं से चुनाव भी नहीं लड़े। हाल में ही मायावाती ने बसपा का बड़ा ब्राह्मण चेहरा और पूर्व मंत्री रहे नकुल दुबे को भी पार्टी से बाहर निकाल दिया गया। नकुल दुबे 2007 में बनी बसपा सरकार में कैबिनेट मंत्री थे। नकुल दुबे को अनुशासनहीनता और पार्टी विरोधी गतिविधियों का कारण बता कर बसपा से बाहर का रास्ता दिखाया गया।

वहीं मायावाती का रुख मुस्लिम नेताओं को भी लेकर यही देखा जा रहा है। मायावाती दलित समाज को छोड़कर बाकी अन्य जातियों के नेताओं से ध्यान हटा रहीं हैं। ऐसे में यही माना जा रहा है मायावाती कांशीराम के रास्ते पर फिर से चल पड़ीं हैं।


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