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पोलटॉक हीरो : राजेश की क्रिकेट खेलने में चली गई थी आँख, बने देश के पहले दृष्टिबाधित आईएएस , अब हैं बोकारो के डीएम


  • आईएएस के लिए दृष्टि नहीं दृष्टिकोण चाहिए : सुप्रीमकोर्ट
  • आईएएस में चयनित होने के बाद भी हुआ था विरोध, मगर क़ानूनी लड़ाई जारी रखी

संतोष कुमार पाण्डेय | सम्पादक

समाज ही नहीं देश का सिस्टम भी दिव्यांगों के लिए बाधा बन जाता है. इन्हें समाज में ही बहुत परेशानी का सामना करना पड़ता है. इसमें जिनकी फैमिली मजबूत (मानसिक रूप से) होती है वो तो सफल हो जाते हैं और जिनकी नहीं होती है वो परेशानी झेलते हैं. उन्हें इन बंधनों का सामना करना पड़ता है. इन्हें लम्बी कानूनी लड़ाई लडनी पड़ जाती है. मगर इन्हें इसी सिस्टम से सफलता भी मिलती है. आइये जानते हैं एक ऐसे ही आईएएस राजेश सिंह (ias rajesh singh) के बारे में जो अब चर्चा में बन गए हैं. वहीँ राजस्थान के दृष्टि बाधित इंटरप्रिन्योर  प्रतीक अग्रवाल, बैंकर पियूष बडरिया, प्रवक्ता संदीप त्रिवेदी, शरद त्रिपाठी, सुनील संतानी, अफसर सुनीता यादव, चेतन शर्मा ने इसे एक बड़ी एतिहासिक जीत बताई है.

राजेश सिंह (rajesh) वर्ष 2007 बैच के आईएएस (ias) हैं. उन्हें झारखंड के बोकारो जिले का जिलाधिकारी नियुक्त किया गया है. पिछले मंगलवार को जब आईएएस अधिकारियों के तबादले की लिस्ट जारी की तो उसमें एक नाम है राजेश सिंह का. जो पूरी तरह से दृष्टिबाधित हैं. चर्चा इसी बात की है. राजेश सिंह (rajesh singh) कैसे जिले का प्रशासन देख पायेंगे क्योंकि वो खुद दृष्टिबाधित हैं. वहीं राजेश सिंह (rajesh singh) की माने तो यह बात तो सुप्रीम कोर्ट ने साफ़ कर दिया है कि आईएएस (ias) अधिकारी को दृष्टि नहीं दृष्टिकोण चाहिए. उनका दावा है कि उनके अंदर जोश है और अनुभव है किसी को कोई दिक्कत नहीं होगी. बड़ी लम्बी कानूनी लड़ाई लड़कर उन्हें यह अधिकार और कार्य करने का अवसर मिला है

झारखंड की मीडिया रिपोर्ट्स के अनुसार राजेश सिंह मूल रूप से बिहार के पटना स्थित धनरुआ के रहने वाले हैं.. दृष्टिबाधित राजेश सिंह ने साल 2007 में यूपीएससी की परीक्षा पास की. राजेश देश के ऐसे पहले दृष्टिबाधित थे, जो IAS बने. हालांकि, उनकी नियुक्ति में कई पेंच आए, लेकिन हक की लड़ाई में उनकी जीत हुई. 2011 में उनकी नियुक्ति हो पाई. अब उन्हें बोकारो का डीसी बनाया गया है.

राजेश सिंह ने तीन बार दृष्टिबाधित क्रिकेट विश्वकप में भी हिस्सा लिया है। वे कहते हैं कि इस सिस्टम में 100 फीसदी दृष्टिबाधित को शामिल करना थोड़ा मुश्किल रहा, लेकिन मैंने कभी उम्मीद नहीं छोड़ी। अंतत: सुप्रीम कोर्ट के निर्णय ने विजन (दूरदर्शिता) और आईसाइट (दृष्टि) में अंतर को स्पष्ट किया। आईएएस बनने के लिए आपमें दूरदर्शिता की जरूरत होती है दृष्टि की नहीं। राजेश सिंह ने अपने जीवन के संघर्षों पर एक किताब लिखी है ‘आई : पुटिंग आई इन आईएएस’।

 


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पोल टॉक और PollTalk.In के सम्पादक संतोष कुमार पांडेय देश के कई शहरों में पत्रकारिता कर चुके हैं। ये शहर जो कार्यस्थल बने वाराणसी , लखनऊ, आगरा, देहरादून, नोएडा, जयपुर, बिहार, हैदराबाद, पानीपत, सतना में रहे हैं। इन संस्थानों में दी सेवाएं राजस्थान पत्रिका , दैनिक भास्कर, एग्रो भास्कर, हिन्दुस्थान, जनसन्देश न्यूज़ चैनल, जनसन्देश टाइम्स, ईटीवी भारत में कई वरिष्ठ पदों पर कार्य किये. राजनीति की सही जानकारी और कुछ रोचक इन्टरव्यू दिखाना प्राथमिकता है।

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