LOCKDOWN : जौनपुर के कोचिंग संस्थान चलाने वाले और प्राइवेट शिक्षकों को भी मदद की दरकार, इधर भी ध्यान दीजिये सरकार

लॉकडाउन का असर सिर्फ मजदूरों पर ही नहीं पड़ा है. देश में कई ऐसे छोटे छोटे संस्थान हैं जो अब पूरी तरह से प्रभावित हो चुके हैं. उनकी कोई सुनने वाला नहीं है. उनके सामने भूखमरी की स्थिति बन गई है. ऐसी ही स्थिति बन गई है कोचिंग संस्थान चलाने वाले और प्राइवेट शिक्षकों की. उनकी कोई देखरेख करने वाला नहीं है. उनके इस लॉकडाउन में परेशानी का सामना करना पड़ रहा है.

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AMIT PANDEY
अमित पांडेय वेव अकादमी के डायरेक्टर.

  • कोचिंग संस्थान चलाने वाले और प्राइवेट शिक्षकों की आर्थिक स्थिति हुई खराब
  • कोचिंग में पढ़ाने वाले शिक्षक हुये बेरोजगार

जौनपुर. लॉकडाउन का असर सिर्फ मजदूरों पर ही नहीं पड़ा है. देश में कई ऐसे छोटे छोटे संस्थान हैं जो अब पूरी तरह से प्रभावित हो चुके हैं. उनकी कोई सुनने वाला नहीं है. उनके सामने भूखमरी की स्थिति बन गई है. ऐसी ही स्थिति बन गई है कोचिंग संस्थान चलाने वाले और प्राइवेट शिक्षकों की. उनकी कोई देखरेख करने वाला नहीं है. उनके इस लॉकडाउन में परेशानी का सामना करना पड़ रहा है. कोचिंग वालों की मांग है कि इसपर सरकार ध्यान दें. नहीं तो उनकी स्थिति दिनों दिन खराब होती जा रही है. उत्तर प्रदेश के जौनपुर जिले के शहर में कोचिंग संस्थान चला रहे अमित पाण्डेय बता रहे हैं पूरी सच्चाई.

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यह है पूरा आर्थिक तानाबाना 

अमित पांडेय वेव अकादमी के डायरेक्टर हैं. इनका कहना है कि जौनपुर सिर्फ मेरी कोचिंग वेव अकादमी एमपीएस क्लासेज में 20 से ज्यादा स्टाफ है। ऐसे ही पूरे जौनपुर में 500 से ज्यादा कोचिंग है। लगभग सिर्फ कोचिंग में पढ़ाने वाले 10 हजार से ज्यादा शिक्षक बेरोजगार है। जिनके सामने खाने का संकट है। अगर स्कूल को जोड़ा जाय तो पूरे जौनपुर में लगभग 25,000 से ज्यादा लोग है। शहरी स्कूल के कुछ टीचर्स को पेमेंट आधी मिली है। बाकी स्टाफ चपरासी और अन्य को कुछ नही। ग्रामीण क्षेत्रो में तो एकदम ही भुखमरी है। कोचिंग़ संचालकों का तो बुरा हाल है।

यह भी सच्चाई है 

एक आंकड़े की माने तो प्राइवेट शिक्षक या कोचिंग में पढ़ाने वाले शिक्षक ज्यादा से ज्यादा 10 से 15 हजार महीना कमा पाते है। पिछले 3 महीने से उन्हें एक रुपया भी नहीं मिला है. उनके सामने संकट है. इससे ज्यादा बुरी हालत कोचिंग संचालकों की होती जा रही है. उन्हें किराया भी देना होगा और पैसा भी नहीं आ रहा है. लगातार उनपर खर्च बढ़ता जा रहा है. सरकार उनका ध्यान रखे. वरना उन्हें बड़ी परेशानी में जाने से कोई रोक नहीं सकता.

यह तो बस एक छोटे से शहर की कहानी है. अगर बड़े शहरों की तरफ जायेंगे तो परेशानी और बढ़ जायेगी. सरकार को इस तरफ भी ध्यान देने की जरुरत है. न की इन्हें भूखा छोड़ दे मरने के लिए.


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