पोलटॉक नेटवर्क। पटना
बिहार में जब भी विधानसभा के चुनाव आते हैं तो बिना बाहुबलियों की ( Bihar Bahubali Leaders ) चर्चा के रोमांचक नहीं हो पाते। पहले इनकी गुंडई और बाहुबल की चर्चा होती थी अब इनके बयान और परिवार की होती है। रोचक बात है कि बाहुबलियों में ज्यादातर निर्दलीय चुनाव मैदान में उतरते थे। अब ये बिना दल के नहीं चल पा रहे हैं। कभी ये सरकार को गिराने और बनाने की भूमिका में रहते थे।
इतना ही नहीं कुछ बाहुबलियों को ‘साहब’ या ‘छोटे सरकार’ की उपाधि तक मिल चुकी है। विधिवत उनकी चर्चा सरकारें भी करती रही हैं। अब विधानसभा चुनाव में ये बिना दल के लड़ नहीं पा रहे है। उनकी पत्नी और बेटे चुनाव मैदान में हैं। पढ़िए ये ख़ास रिपोर्ट सिर्फ पोलटॉक पर ।
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ये है बाहुबलियों की कहानी ?
पूर्णिया से निर्दलीय सांसद राजेश रंजन उर्फ़ पप्पू यादव (mp pappu yadav bihar ) अब कांग्रेस के करीब जा रहे हैं। कभी आरजेडी के प्रमुख नेताओं में से एक हुआ करते थे। मगर, उन्होंने 2015 में अपना दल बनाया लेकिन उन्हें सफलता नहीं मिली। फिर निर्दलीय ही मैदान में उतरे। वर्ष 2024 में लोकसभा का चुनाव जीत गए। उनकी पत्नी कांग्रेस से राज्यसभा सदस्य हैं। बिहार में 90 के दशक में पप्पू यादव का बोलबाला था। उस दौरान पप्पू यादव निर्दलीय विधायक बने और कई बार सांसद रहे। जानकारी के अनुसार उनपर 30 से अधिक आपराधिक मामले दर्ज है।
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सूरजभान सिंह (Surajbhan Singh) का 90 के दशक से बिहार की राजनीति में दबदबा बना हुआ है। मोकामा से निर्दलीय विधायक बने। उसके बाद 2004 में लोजपा के टिकट पर सांसद का चुनाव जीते। जब उनपर चुनाव लड़ने की रोक लग तो उन्होंने अपनी पत्नी को लोकसभा के चुनाव में उतार दिया। वीणा सिंह लोजपा के टिकट पर सांसद बनीं।
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सिवान का शहाबुद्दीन ( shahabuddin siwan ) बिहार की राजनीति में बड़ा नाम था। कई बार बिहार की विधानसभा से विधायक और लोकसभा सदस्य रहे। शहाबुद्दीन के लोग उन्हें सिवान में साहेब के नाम बुलाने लगे थे। शहाबुद्दीन की पत्नी हिना साहब ने कई बार चुनाव लड़ा लेकिन वो जीत नहीं पाई। उन्हें हार का सामना करना पड़ा। अब शहाबुद्दीन के परिवार से कोई राजनीति में प्रमुख पद पर नहीं है।
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बिहार की राजनीति में आनंद मोहन ( anand mohan ) 90 के दशक का एक बड़ा नाम। विधायक और कई बार सांसद रहे। उनके बेटे विधायक और पत्नी सांसद हैं। हालाँकि, अब आनंद मोहन चुनाव मैदान में नहीं है। मगर, उनका अभी भी राजनीति में सिक्का बना हुआ है।