पोल टॉक नेटवर्क। जयपुर
राजस्थान (Rajasthan Politics) की तपती ज़मीन पर सियासत का पारा इन दिनों और भी गरम है। एक राजनीतिक दल में पदाधिकारियों की सूची का इंतजार कार्यकर्ताओं के सब्र की परीक्षा बनता जा रहा है। बाहर से सबकुछ सामान्य दिखता है, लेकिन भीतर गहरी उथल-पुथल मची हुई है। कुछ खबरें हवा में तैर रही हैं, कुछ नाम वायरल हो गए हैं… और कुछ चेहरे बीमार होने लगे हैं।
वायरल सूची और बड़ी उम्मीदें
कुछ दिन पहले अचानक सोशल मीडिया पर एक सूची वायरल हो जाती है। इसमें कुछ युवा नेताओं के नाम होते हैं। जिनके नाम होते हैं, उनके समर्थक मिठाइयां बांटने लगते हैं, लेकिन जिनके नाम नहीं होते-वो अवसाद में चले जाते हैं। कई पुराने कार्यकर्ता इस असमंजस से इतने परेशान हैं कि मानसिक तनाव की गिरफ्त में आ गए हैं। कुछ तो इलाज तक करवा रहे हैं। राष्ट्रीय स्तर के नेता इस मसले पर चुप हैं। न कोई बयान, न कोई सफाई। संगठन के अंदरूनी सूत्रों का कहना है कि जब तक यह स्थिति बनी रहेगी, कार्यकर्ताओं का भरोसा डगमगाता रहेगा।
नाराज़ अध्यक्ष और बेलगाम नेता
एक पार्टी के प्रदेश अध्यक्ष का गुस्सा अब छिपा नहीं रहा। वो बार-बार निर्देश देते हैं कि संगठन में अनुशासन बनाए रखा जाए, लेकिन उनके ही कुछ वरिष्ठ नेता अपनी-अपनी धुन में चल रहे हैं। कोई अपने जिले में विशाल सम्मेलन कर रहा है तो कोई बिना अनुमति रैली निकाल रहा है। प्रदेश अध्यक्ष ने दिल्ली तक अपनी शिकायत पहुंचा दी है, लेकिन वहां से भी कोई खास प्रतिक्रिया नहीं मिल रही। अब तो चर्चा ये भी है कि प्रदेश के कुछ बड़े नेता ही इस ‘खेल’ के सूत्रधार हैं।
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दिग्गजों की दुविधा
राजस्थान की राजनीति के दो बड़े ड़े चेहरे, जो कभी रणनीति के मास्टरमाइंड माने जाते थे। आज खुद उलझन में हैं। उन्हें लगता था कि वे अपनी पकड़ से संगठन को अपने अनुरूप ढाल लेंगे, लेकिन अब स्थितियाँ उनके खिलाफ हो गई हैं। मंच पर वो एक बात कहते हैं, लेकिन चाय के प्याले के साथ अपने समर्थकों से कुछ और। उनका आत्मविश्वास हिल चुका है। उन्हें समझ नहीं आ रहा कि अगला कदम क्या हो। दिल्ली जाएं ? या खुद को अलग कर लें?
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अगर युवाओं को मिले मौका…
वर्तमान संकट के बीच एक बात सभी को समझ आने लगी है। अगर संगठन को ऊर्जा देनी है, तो युवाओं को मौका देना ही होगा। युवा कार्यकर्ताओं में जोश है, नये विचार हैं और सोशल मीडिया के ज़रिए जनसम्पर्क की नई भाषा भी। कुछ युवा नेता अब खुले मंचों पर बोलने लगे हैं, “अब पुरानी राजनीति नहीं चलेगी, हमें परिवर्तन चाहिए।” अगर सही दिशा में नेतृत्व मिला, तो यही युवा संगठन को फिर से जीवंत बना सकते हैं।
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अंदरूनी हलचल और बाहर की खामोशी
संगठन के भीतर की खामोशी बहुत कुछ कह रही है। पदों की दौड़, नाराज अध्यक्ष, असहाय दिग्गज और भ्रमित कार्यकर्ता हैं। ये सब मिलकर एक ऐसे नाटक की पटकथा तैयार कर रहे हैं, जिसकी स्क्रिप्ट किसी को समझ नहीं आ रही। लेकिन यह तय है की अगर जल्द ही पारदर्शिता, संवाद और संगठनात्मक अनुशासन नहीं लौटा, तो यह खामोशी एक दिन शोर में बदल सकती है। और तब हालात संभालना मुश्किल होगा।

